असम चुनाव: बांग्ला भाषी हिंदुओं को लगता है कोई उनकी सुध नहीं लेता

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  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता, बारपेटा, असम से
30 मार्च 2021, 17:22 IST

अपडेटेड 53 मिनट पहले

रतन सेन

मृगेंद्र कुमार घोष (बदला हुआ नाम) की पाँच पीढ़ियां लोअर असम के बारपेटा के इलाक़े में दशकों से रहती आ रही है. अब उनकी उम्र 60 के आसपास होने वाली है. उनके परिवार में कुल मिलाकर दस सदस्य हैं.

असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़नशिप यानी एनआरसी के तहत कार्रवाई शुरू हो गई है. परिवार के सभी सदस्यों के नाम उसमें शामिल कर लिए गए हैं मगर उनके एक भाई का नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं है.

उनके भाई को ‘डी-वोटर’ यानी ‘डाउट्फुल-वोटर’ या विवादित वोटर के रूप में चिन्हित किया गया है.

इसका मतलब ये है कि वे अपनी नागरिकता प्रमाणित करने में कामयाब नहीं रहे या फिर नागरिकता पर विवाद के निपटारे को लेकर असम में बनाए गए ट्रिब्यूनल के अधिकारियों को अपनी नागरिकता को लेकर संतुष्ट नहीं कर पाए.

डिटेन्शन कैं

मृगेंद्र कुमार घोष (बदला हुआ नाम) ने जो काग़ज़ ट्रिब्यूनल में जमा किए, उन्हें ख़ारिज कर दिया गया और उन्हें ‘डिटेंशन कैम्प’ में भेज दिया गया.

पिछल साल केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने लोकसभा को बताया कि फिलहाल असम में कुल छह ऐसे ‘डिटेंशन कैम्प’ मौजूद हैं जिनमें 3,331 लोगों को रखा गया है. ये कैंप ग्वालपाड़ा, कोकराझार, जोरहट, डिब्रूगढ़, सिलचर और तेजपुर में मौजूद हैं.

लेकिन रेड्डी ने स्पष्ट किया कि ‘एनआरसी से संबंधित कोई भी ‘डिटेंशन कैंप’ नहीं है. उनका कहना था कि जो लोग इन कैंपों में रखे गए हैं, उनका भारत में अवैध रूप से रहना प्रमाणित हो चुका है.

उनका ये भी कहना था कि इन कैंपों में रखे गए लोगों ने नियमों का उल्लंघन किया है और इसके साक्ष्य मिलने पर ही उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई है.

ये वो लोग हैं जिनका विदेशी होना प्रमाणित हो चुका है.

लेकिन इस साल राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जो बयान दिया, उसमें विरोधाभास था. उनका कहना था कि कितने लोग डिटेंशन कैम्पों में हैं, इसका कोई डेटा केंद्रीय स्तर पर रखा नहीं जाता है.

उनका कहना था कि ये पूरी तरह से राज्यों का मामला है. उन्होंने स्पष्ट किया कि एनआरसी और नागरिकता क़ानून साल 1995 के तहत भी डिटेंशन कैंपों का कोई प्रावधान नहीं है.

लेकिन साल 2019 तक चली एनआरसी की प्रक्रिया के बाद असम के 19 लाख लोगों को डी-वोटर के रूप में चिन्हित किया जबकि 3.3 करोड़ लोग इस प्रक्रिया से गुज़रे थे.

बीते साल कोरोना महामारी के शुरू होने के बाद अदालत के आदेश पर लगभग 300 लोगों को इन कैंपों से ज़मानत पर रिहा किया गया.

नागिकता संशोधन क़ानून से जगी थी उम्मीद

जब साल 2019 में केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून को अदालत से पारित कराया था, उस समय असम के डी-वोटर घोषित किए गए 19 लाख लोगों की उम्मीदें जगीं. तब ये कहा गया था कि जिन ग़ैर-मुसनमानों के नाम एनआरसी में छूट गए हैं, उन्हें नए पारित किए गए नागरिकता संशोधन क़ानून का लाभ मिलेगा और वो इसमें शामिल कर लिए जाएंगे.

लेकिन लोअर असम के बारपेटा में बांग्ला भाषी हिन्दुओं की आबादी काफी निराश है. उनके कई लोग अभी भी डिटेंशन सेंटर में बंद हैं.

असम बंगाली युवा-छात्र फेडरेशन के सलाहकार रतन कुमार सेन कहते हैं कि जब नागरिकता संशोधन क़ानून पारित हुआ था तो उनके समाज की उम्मीदें जगी थीं.

वे कहते हैं, “नया क़ानून पारित हुआ. हमने स्वागत किया. हम सब खुश थे कि चलो इतने दिनों का हमारा संघर्ष ख़त्म होगा. अब हम चैन से रह सकेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमें आज भी राज्य सरकार की तरफ़ से नोटिस मिल रहे हैं. हमसे कहा जा रहा है कि हम अपने नागरिकता को प्रमाणित करने वाले दस्तावेज़ लेकर एनआरसी के ट्रिब्यूनल के सामने उपस्थित हों. हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया.”

लोअर असम में बांग्ला भाषी हिन्दुओं की भी बड़ी आबादी है मगर इस समुदाय को लगता है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों ने उनके समुदाय की अनदेखी की है.

वो बताते हैं कि चुनावों के दौरान राजनीतिक दल वायदे तो करते हैं और समर्थन मांगने भी आते हैं, मगर फिर कोई इस समुदाय को पूछता भी नहीं.

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बिनय घोष बांग्ला भाषी हिंदू समुदाय से हैं और वो एनआरसी से बाहर किए गए अपने लोगों की बढ़-चढ़कर मदद करने में लगे हुए हैं. घोष ने बीबीसी से कहा कि राजनीतिक दल उनके समुदाय के लोगों को टिकट भी नहीं देते हैं. इसलिए उनकी आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है.

समुदाय के लोगों का कहना है कि जब नागरिकता संशोधन क़ानून लाया गया तो उसमें कहा गया कि जो भारत के पड़ोसी राज्य जैसे बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में प्रताड़ित किए गए सिख और हिन्दु, जो प्रताड़ना की वजह से भारत में शरण लेने 31 दिसंबर 2014 से पहले आए, उन्हें नागरिकता प्रदान की जाएगी.

लेकिन रतन सेन कहते हैं कि बांग्लादेश से 1971 या उससे पहले प्रताड़ना का शिकार हुए बंग्ला भाषी हिंदू भारत में आए और उन्होंने शरण ली. लेकिन इतने सालों के बाद भी इस समुदाय के लोगों को घुसपैठिए के रूप में ही देखा जाता है.

असम विधानसभा चुनाव

एनआरसी की प्रक्रिया

जानकार कहते हैं कि एनआरसी की प्रक्रिया शुरू की गई थी तो आशंकाएं थीं कि इसके तहत सिर्फ बांग्ला भाषी मुसलामानों को परेशानी होगी. लेकिन जब प्रक्रिया पूरी हुई तो बांग्ला भाषी हिन्दुओं की संख्या डी-वोटरों में बांग्ला भाषी मुसलामानों से ज़्यादा हो गई.

बांग्ला भाषी युवक संघ से जुड़े शुभम कहते हैं कि डी-वोटर घोषित होने वाले परिवारों को न आधार कार्ड मिलता है, न राशन कार्ड, न नौकरी और न ही वो ज़मीनें ही ख़रीद सकते हैं.

जब पश्चिम बंगाल में प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने घोषणा की थी कि चुनावों के बाद सीएए यानी नागरिकता संशोधन क़ानून लागू कर दिया जाएगा तो असम के बांग्ला भाषी हिन्दुओं को फिर उम्मीद जगी. मगर पार्टी ने असम के लिए जो घोषणापत्र जारी किया उससे ये मुद्दा पूरी तरह गौण रखा गया.

अलबता पार्टी की तरफ़ से इतना आश्वासन ज़रूर आया कि असम में चुनावों के बाद एनआरसी में जो त्रुटियाँ हो गई हैं उनको ठीक कर दिया जाएगा और सही दस्तावेज़ के बावजूद जिनके नाम एनआरसी में नहीं आ पाए हैं, उन्हें भी शामिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी.

असम विधानसभा चुनाव

पूर्वोत्तर मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार किसलय भट्टाचार्य का कहना है कि असम कभी बंगाल का हिस्सा हुआ करता था, इसलिए इन इलाक़े में बड़ी संख्या बांग्ला भाषियों की भी है.

असम अलग राज्य बना तो जो बांग्ला भाषी हिंदू और मुसलमान थे, वो भी यहीं रह गए. लेकिन सामाजिक रूप से असमिया हिंदू और मुसलमान एक तरफ़ संगठित रहे जबकि बांग्ला भाषी दूसरी तरफ़.

यही वजह है कि हमेशा इन दोनों के बीच संघर्ष रहा. वे कहते हैं कि असम समझौते में ये प्रावधान करने की बात कही गई कि साल 1971 से पहले जो लोग यहाँ आकर बस गए, उन्हें यहीं का बाशिंदा माना जाएगा.

किसलय के अनुसार जब असम बंगाल का ही हिस्सा था तो बांग्ला भाषी लोगों का मौजूद रहना स्वाभाविक था. मगर इनकी मौजूदगी असमिया सम्मान को ठेस पहुँचाती रही.

वे ये भी कहते हैं कि किसी भी राजनीतिक दल ने दोनों के बीच सामंजस्य बनाने की ईमानदार कोशिश ही नहीं की.

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